सोलह संस्कार ही हमारा जीवन है

Medical Astrology by Astrologer Jayesh Dave.


हिन्दू धर्म में संस्कारवान होना बहुत जरुरी है। संस्कारवान मनुष्य को समाज में काफी मान सम्मान तो मिलता ही है व ईश्वर की कृपा सदा बनी रहती है। इन कारणो से ही मनुष्य का जीवन सुखी व धनी हो जाता है। माना जाता है कि जिस मनुष्य ने अपने जीवन काल में 16 के 16 संस्कारों को विधिवत कर लिया हो तो मरने के बाद भी ऐसा मनुष्य सुख भोगता हुआ अगले जन्म में भी सुखी रहता है।

हिन्दू धर्म के मुताबिक जीवन में विभिन्न अवसरों पर 16 संस्कार करने का विधान है। हमारे ऋषि मुनियो व कुछ ग्रथों के अनुसार 14 से लेकर 40 तक संस्कार बताये गये है, पर ज्यादातर विद्वानो ने 16 संस्कारों को ही महत्व दिया है। इनको पूरा करने से मन के विकार नष्ट हो कर मानव तन, मन व धन से सुखी होकर मोक्ष ही पाता है। संस्कारों के समय होने वाले कर्मकांड , हवन ,मन्त्र, पाठ, पूजा ,दान आदि की प्रक्रिया विज्ञानिकों के मूल्यो पर प्रमाणित की जा चुकी है।

कहते है हर मनुष्य जो जन्म लेता है जन्म से ही शुद्र होता है व संस्कार ही इंसान को ब्राह्मण बनाते है। ब्राह्मण कर्म कांड करने वाला ही नहीं होता बल्कि 16 संस्कार करने वाला भी ब्राह्मण तुल्य माना गया है। चाहे वो किसी भी जाति का क्यों न हो। हिन्दू धर्म में कोई ऐसा इंसान नहीं जिसने अपने पूरे जीवनकाल में 16 न सही पर दो या चार संस्कार तो अवश्य ही किये है।

अगर कोई ये माने की यह सब व्यर्थ की बात है तो उस इंसान से मेरी यह गुजारिश है की 16 संस्कार क्या है इसके बारे में पूर्ण लेख आगे है कृपया इसे पढ़े पढने के बाद ठन्डे मन से सोच विचार कर अपने मन को ही बता दे कि यह तो सत्य है, जी हाँ, यह सत्य है हाँ कुछ विधि विधान अलग हो सकते है पर इस का मूल तो संस्कार ही है।

गर्भधान संस्कारः

दाम्पत्य जीवन का सबसे बड़ा उदेश्य यही है की श्रेष्ठ गुणो वाली ,शरीर से स्वस्थ ,चरित्रवान ,संस्कारी संतान को उत्पन्न करना जो आगे चल कर अपने व अपने परिवार के साथ साथ समाज का कल्याण भी कर सके। यूँ तो प्राकृतिक रूप से उचित समय पर सम्भोग करने से संतान का होना स्वाभाविक है पर कुछ दम्पति आज भी संतान उत्पन्न करने से पहले उस पर विचार करते है। कुछ तो डॉक्टर की सलाह ले कर कार्य करते है। जो कि आज के समय में जरुरी भी है पर साथ में गर्भ धारण से पूर्ण इस बात पर भी विचार करे जो गर्भधारण संस्कार में भी होती है। जिसमे गर्भधारण करने से पूर्व समय स्थान के अनुसार तिथि महूर्त का भी विशेष महत्व है वैसे तो कई मंत्रो का भी गर्भ धारण से पूर्व करना जरूरी होता है पर अक्सर देखा जाता है कि कोई कम ही ध्यान देता है इन बातो पर सर्व प्रथम तो माता पिता को अपनी होने वाली संतान के लिए मानसिक व शारीरिक रूप से तैयारी करनी पड़ती है, क्योकिं आने वाली संतान उनकी ही आत्मा का प्रतिरूप होती है। इस लिए ही पुत्री को आत्मजा व पुत्र को आत्मज कहते है सुश्रुत सहिंता के अनुसार और वेसे भी स्त्री व पुरुष जैसा आहार व्यवहार और अपनी इच्छा में संयुक्त होकर परसपर समागम करते है उनकी संतान भी उसी स्वभाव की उत्पन्न होती है।

आपने अक्सर देखा होगा की गर्भ धारण करने के बाद स्त्री के कमरे में सुबह उठते ही उसकी आँखो के सामने सुन्दर शिशु का चित्र लगा देते है जो उसके मन भाव से उसी प्रकार की संतान चाहने का रूप होता है। यह सही है पर अपने कुल के या किसी महांपुरुष का चित्र भी उसके आवभाव का बच्चे पर प्रभाव छोड़ता है जो बच्चे को अपनी माँ के मन से पैदा हुए विचारो से प्राप्त होता है।

पुत्र व पुत्री की प्राप्ति के लिए हमारे ग्रंथों में बहुत कुछ दिया है हमने अपने पहले लेख में भी इसका काफी विवरण दिया है (कैसे पा सकते है मनवांछित औलाद ) धर्म परायण के अनुसार पति पत्नी को गर्भ धारण करने से पूर्व अपने व दुसरो के हित के लिए व उस बच्चे के लिए जो अभी मन में है बीज नही बना उसके लिए अपने गुरु व बड़ो आदि का आशिर्वाद लेकर प्रार्थना करनी चाहिए। रात्रि के तीसरे पहर गर्भ धारण करने से संतान हरिभक्त व धर्म परायण होती है। इस के लिए वर्जित समय भी है जो काफी हद तक हम अपने उस लेख में भी बता चुके है पर कुछ जानकारी यहां भी बता देते है कि योग्य संतान के लिए वर्जित समय जैसे धर्म के समय , गन्दगी या मालिनता वाला स्थान ,सुबह या सांय के समय ,चिंता क्रोध व बुरे विचारो के साथ ,श्राध या प्रदोष काल में किसी दुसरे के घर ,मंदिर ,धर्मशाला ,शमशानघाट ,नदी किनारे ,समुद्र के मध्य गति से दौड़ते किसी वाहन के मध्य ,घर में शोक ,या काफी शोर के मध्य इन सब बातो व समय ,स्थान को (वर्जित )ध्यान में रख कर ही गर्भ धारण करना चाहिये। गर्भ धारण संस्कार करने से पहले औरत को चाहिये की ऋतुकाल में रजोदर्शन के बाद स्नान कर पूर्वकाल रहित चौथे दिन या सम दिन में महॅूर्त विचार कर देवी देवताओं का पूजन कर सोभाग्यशाली व पुत्रवान स्त्रिओं से फल ,नारियल आदि लेकर आमवस्या की अधिष्ट देवी व सरस्वती के मंत्र पाठ पुजा प्रार्थना कर व बाकी देवी ,देवता ,ग्रह ,नक्षत्र देवताओं को अपने गर्भ को पुष्ट करने हेतु प्रार्थना कर पुनः ब्राहम्णो को दान व भोजन का सेवन करवा कर सुंदर व गुणवान बच्चे के लिए आशिर्वाद लेना चाहिये।

पुंसवन सस्कार:

पुसंवन सस्कार 16 सस्कारो में दूसरे स्थान पर आता है जिसका गहरा समबन्ध तो पहले सस्कार से ही है जैसे कोई भी किसान समय व रितु को देख कर उस में बीज बोता है व बीज बोने के बाद उस पौधे की पूर्ण देखभाल करता है ताकि वो छोटा सा पौधा कही आने वाले मौसम की मार में ही न मर जाये जैसे किसान की सोच पौधे को पैदा करने तक उसकी रक्ष करनी होती है वैसे ही पहले सस्कार को करने के बाद दूसरे संस्कार को भी जरूरी माना गया है. पुंसवन संस्कार को गर्भ धारण करने के बाद तीसरे महीने करना चाहिए. वैसे तो इसे दूसरे महीने के अन्त में या तीसरे महीने में शुभ महुर्त को देख कर करना चाहिये. इस संस्कार को करने का कारण मुख पुत्र रत्न की प्राप्ती के लिए किया जाता है, पर आज के समय में हमारा अनुभव खता है की पुत्र हो या पुत्री दोनों ही समान है जहाँ यह संस्कार पुत्र के लिए कर सकते है तो पुत्री के लिए क्यों नही कर सकते आज पुत्री भी तो पुत्रो से कम नही है. मैने इस संस्कार को करने का उदेश्य यह है की बच्चे के गर्भ में रहते तीसरे महीने लिंग का निर्धरण होता है जिससे उसके अंगो का विकास होना यह संस्कार की विधि से उसे पुर्ण व स्वास्थ्य अंगो के निर्माण के लिए किया जाता है इस समय में शास्त्र के मुताबिक गर्भनी को विशेष बरगद के अकुंश को दूध में पीस कर इसका रस पुत्र के लिए दक्षिण व पुत्री के लिए वाम नास पुट में डालने का विधान है जैसे हमने अपने पहले लेख में भी नासिका के बारे में बताया है वैसे ही इसका नियम है इसके लिए गर्भनी को चाहिये की गणेश आदि देवताओं का पुजन कर स्वास्थ्य अंगों की प्रार्थना करे व वरुण देव ,अशिवन कुमार ,वायु व सब पुरुष देवता ,इस गर्भ में पल रहे बच्चे के अगों को पुर्ण विकसित करे व जन्म लेने तक इसकी रक्षा करते रहे. उसी प्रार्थना को करते हुये गायत्री मंत्रो से किसी अच्छे विद्वान् पण्डित से गायत्री मंत्र देसी घी की रुक सो आठ आरती दे कर ब्राह्मण को भोजन व दान दे कर आशिर्वाद गृहण करे ऐसा करके दूसरे संस्कार को संपन्न किया जाता है .

 

सीमन्तोन्यन संस्कार:

यह संस्कार भी गर्भिणी स्त्री के पेट में पल रहे बच्चे के लिए ही किया जाता है इस समय में गर्भिणी स्त्री को शुद्ध व प्रसन्न मन से यह संस्कार करना चाहिये बालक के जन्म तक हर समय प्रसन्न रहना चाहिये इस संस्कार को गर्भ में पल रहे बालक की रक्षा करनी इच्छा की पूर्ति के लिए पांचवे या छटे मास में शुभ महुर्त में देवताओ का पुजन आदि कर पुरुष वाचक नक्षत्र में शुक्ल पक्ष में व गर्भनी की कुंडली हो तो चन्द्र गृह आदि की अनुकूलता को देख कर करना चाहिये जिससे बच्चे के अंग विकसित हो रहे हो उनकी पुष्टता व स्वास्थ्य के लिए जरूरी है क्योकि पांचवे व छटे महीने में इन अंगो में चेतना का संचार बध जाता है ऐसे में पति पत्नी दोनों विधि पूर्वक इसको करना चाहिये पुर्ण विधि के लिए किसी भी विद्वान् ब्राह्मण से संपर्क कर सकते है ऐसे में ब्राह्मण तो विधि पुर्वक करेगा साथ में गर्भनी की सुहागन स्त्रियो द्वारा मांग भरी जाती है व उसे उत्तम भोजन कराया जाता है व उसके बच्चे के स्वास्थ्य के लिए मिल कर प्रार्थना कर गर्भनी को प्रसन्न चित रखा जाता है ब्राह्मण को विधि के बाद दान दक्षिणा दे कर आर्शिवाद लेना इस संस्कार का नियम है इस संस्कार के समय काफी बाते गर्भनी को बताई जाती है जो की बच्चे के हित के लिए होती है पांचवे -छटे महीने के बाद वैसे भी गर्भनी को कई हिदायते देते है क्योकि उस समय गर्भ में बच्चा अपना रूप बना चुका होता है ऐसे में कोई किसी भी प्रकार का दोष उसके अंगो को नुकसान न दे.

 

जात कर्म संस्कार :

जात कर्म उस समय होता है बालक का जन्म होता है उस समय घर व अपने आप में स्वछता रखनी होती है पर आज कल समय में तो अधिकाश बालक घर की बजाय होस्पीटल में ही जन्म लेते है, सो अधिकाश कार्य होस्पीटल में ही हो जाता है जैसे बालक का स्नान ,नाल छिद्र ,दुध पिलाना ,बच्चे व माँ के स्वास्थ्य के लिए कार्य करना बच्चे को माँ के गर्भ से अलग होने पर किसी शुभ हाथो से शहद आदि का देना यह सारे- के सारे वही पर ही हो जाती है इसी में छठी पुजन विधान है जो की कई बार होस्पीटल या घर पर किसी बड़े बजुर्ग द्वारा ही कर दिया जाता है जिसका सबसे बड़ा कारण यह होता है की बच्चे के जन्म के बाद उसके हाथ ,पैर ,सिर , धड़ आदि अंगो का पुर्ण विकास हो व यह अंग निरोगी रहे.ऐसे समय में माँ व बच्चे को उत्तम भोजन दिया जाता है माँ को भोजन उसके शरीर व मानसिक संबन्धि व बच्चे को पुर्ण रूप से स्वास्थ्य करने हेतु कार्य भी किये जाते है. कुछ लोग जातकर्म संस्कार को पुर्ण विधि से करते है क्योकि उस समय घर पर नये बच्चे का आगमन का समय होता है व हर तरफ से बधाइयां मिलती है पिता व माँ उस बच्चे की पुर्ण ख़ुशी के महोल में होते है ऐसे में दान धर्म पाठ पुजा आदि ख़ुशी के कार्य संपन्न कर बच्चे के भविष्य की सोच पर विचार शुरू हो जाता है ऐसे समय में बच्चे के शरीर से गंध निकलती है वो हर किसी को आकर्षित करती है व खास कर उस समय बच्चे की पूरी रक्षा की जाती है कही कोई जानवर आदि उस बच्चे को नुकसान न पहुचाये .दान धर्म द्वारा इस संस्कार को संपन्न किया जाता है.

 

नामकरण संस्कार :

यह संस्कार पैदा हुये बच्चे के माता पिता अपने बच्चे के नाम करण के लिए करते है इस संसकार को जन्म से 11 दिन बाद किया जाता है उस समय किसी ब्राह्मण द्वारा विधि वत पाठ हवन यग आदि करवा कर देवताओ ब्राह्मण व आये हुये संबंधियो को प्रसन्न कर बच्चे को उसके नाम से जानने हेतु नामकरण करवाया जाता है उस समय ब्राह्मण गृह नक्षत्र योग करण गण योनि पाया आदि का जिस समय बच्चा पैदा हुआ था उस आधार पर जन्म कुंडली बना कर राशि व उसके स्वामी के बारे में माता पिता को बता देते है कई बातो में न जाकर अपने आप ही बच्चे का नाम तय कर लेते है तो कई लोग सिद्ध महापुरषो के नाम पर अपने बच्चे का नाम रख लेते है यह वही नाम करण संस्कार है जो जीवन भर बच्चे को उस नाम से जाना जाता है

निंक्रमण संस्कार :

यह सस्कार उन 16 संस्कार में से छटे स्थान पर आता है इसे भी बच्चे के लिए किया जाता है इस सस्कार को चतुर्थ मास में चन्द्र शुक्ति पूर्व दिशा में यात्रोक्त शुभ दिन में किया जाता है इसमे सबसे पहले बच्चे को सूर्य दर्शन करवाये जाती है व अन्य गृह देवी देवताओ को नमस्कार व दर्शन करवा कर बच्चे को रात्रि समय चन्द्र दर्शन करवाये जाते है ऐसा इस लिए किया जाता है की चार मास बाद बच्चे का शरीर इतना स्वास्थ्य व पुष्ट हो चुका होता है वो इन सब के वेग को सह सके व उसी समय के दोरान बच्चे को बाहर भी लाया जाता है जो की दुनिया को व दिन रात की स्थिति को देख सके ऐसे में पूर्ण विधिवत यह संस्कार किसी ब्ररे गृह व देवताओ के पुजन से किया जातााह्मण सा है उस समय सूर्य देव को जल ,दुध ,गन्ध ,फल आदि समर्पण किये जाता है व मंत्रो द्वारा पाठ पुजा सम्पन कर ब्रह्मणो को दान दक्षिणा दे कर ख़ुशी मनाई जाती है और कामना करते हुये उसे हर संकट से दुर रखने के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर यह संस्कार संपन्न किया जाता है .

 

अन्न प्राशन संस्कार:

छठे संस्कार को पुर्ण करने के बाद सातवा संस्कार अन्न प्राशन संस्कार कहलाता है इसे बालक के जन्म के बाद छठे व आठवे माह में व कन्या का पांचवे व सातवे माह में किया जाता है इस संस्कार से बच्चे के शरीर को पुष्ट करने व उसकी रुचि का परिचय प्राप्त किया जाता है इसका मतलब स्पष्ट रूप से यह है की उसे पेय पदार्थ दुध आदि के इलावा खादय पदार्थ देना प्रारंम्भ किया जाता है यह संस्कार जन्म लग्न जन्म गृह व नक्षत्रो को देखते हुये शुभ महुर्त में करने के लिए हमारे विधवानो ने खास संस्कार को करने के लिए पाठ पुजा कुल देव की पुजा या यग - हवन आदि से विधिवत करना चाहिये उस समय बच्चे को मीठा - नमकिन - कड़वा , आग्ल युक्त रस नर्म भोजन आदि से प्रारम्भ करना चाहिये . असल इ